सवाल तो पूछेंगे❓
————
फतेहपुर। जनपद में पत्रकारिता का नया दौर चल पड़ा है। अब पत्रकारों और फोटो जर्नलिस्टों का काम खबर ढूंढना नहीं, बल्कि प्रेस नोट का इंतजार करना रह गया है। प्रशासनिक बैठकों में कैमरा लेकर पहुंचना तो आसान है, लेकिन मनचाही फोटो लेना किसी बड़े मिशन से कम नहीं।
एक समय था जब अधिकारियों के कार्यालयों से पत्रकारों को फोन कर बैठकों की सूचना दी जाती थी। फोटो जर्नलिस्टों से कहा जाता था कि भाई साहब, आ जाइए, कुछ तस्वीरें भी ले लीजिए। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि पहले तो सूचना नहीं मिलती, और अगर किसी तरह जानकारी मिल भी जाए तो कैमरे का लेंस उतनी ही आज़ादी पा सकता है जितनी अनुमति मिल जाए।
तहसील मुख्यालयों में लगने वाले समाधान दिवस भी अब “समाधान” से ज्यादा “अनुमति दिवस” बनते जा रहे हैं। कई बार फोटो और वीडियो बनाने की कोशिश करने वाले पत्रकारों को ऐसे देखा जाता है मानो वे कोई गोपनीय रक्षा सौदे की रिकॉर्डिंग करने आ गए हों।
नतीजा यह है कि अखबारों में वही फोटो छप रही हैं जो सरकारी कैमरे से निकलकर सरकारी प्रेस नोट के साथ आती हैं। पत्रकार अब खबर कम और प्रेस नोट अधिक पढ़ रहे हैं। फोटो जर्नलिस्टों की हालत तो ऐसी हो गई है कि वे कैमरा लेकर जाते जरूर हैं, लेकिन कई बार लौटते समय कैमरे में उतनी ही तस्वीरें होती हैं जितनी जाते समय थीं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बैठकें, कार्यक्रम और समाधान दिवस आम जनता के हित में आयोजित किए जा रहे हैं, तो फिर पत्रकारों और फोटो जर्नलिस्टों से आखिर क्या छुपाया जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पारदर्शिता भी अब केवल प्रेस नोट में ही दिखाई देती है!
फिलहाल पत्रकारों की नई कार्यशैली कुछ यूं बन गई है—”कार्यक्रम चाहे जैसा हो, फोटो वही चलेगी जो व्हाट्सएप पर आएगी।”
✍️ “नागेंद्र सिंह”अध्यक्ष फतेहपुर प्रेस क्लब
