सवाल तो पूछेंगे❓
👉पौधे बड़े हो गए, लेकिन गौशालाएं अब भी छांव को तरस रहीं!
फतेहपुर में पर्यावरण दिवस पर पौधारोपण की तस्वीरें खूब वायरल हुईं। कहीं नेता जी फावड़ा चला रहे थे, कहीं अधिकारी पौधों को पानी पिला रहे थे। कैमरे चमके, फोटो खिंचीं और पर्यावरण बचाने के संकल्प भी लिए गए।
लेकिन जनाब, एक छोटा सा सवाल है… क्या गौशालाएं पर्यावरण के दायरे में नहीं आतीं?
सरकार के आंकड़े बताते हैं कि बीते वर्षों में करोड़ों पौधे लगाए गए। मगर जिले की तमाम गौशालाओं में गौवंशों को आज भी पेड़ों की छांव नसीब नहीं है। चिलचिलाती धूप में गोवंश हांफ रहे हैं और टीनशेड गर्म तवे की तरह तप रहे हैं। बरसात में भी यही टीनशेड राहत कम और परेशानी ज्यादा देते हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस “गौ माता” के नाम पर राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, उन्हीं गौ माताओं के आश्रय स्थलों में हरियाली का अकाल दिखाई देता है। जनप्रतिनिधियों को गौशालाओं की सुध है और न जिम्मेदार अधिकारियों को वहां पेड़ लगाने की फिक्र।
अब सवाल यह है कि पर्यावरण दिवस और वन महोत्सव के पौधे आखिर जाते कहां हैं? क्या गौशालाओं में वृक्षारोपण करने पर कोई रोक है? या फिर गौवंशों को धूप में तपने के लिए उनके हाल पर छोड़ देना ही व्यवस्था की मजबूरी बन चुका है?
फोटो से पर्यावरण जरूर बचता दिख रहा है, लेकिन गौशालाओं में खड़े बेजुबान गोवंश शायद अब भी एक पेड़ की छांव का इंतजार कर रहे हैं। सवाल तो जिम्मेदार अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए कि
👉 करोड़ों पौधे लगाए जाने के दावों के बावजूद गौशालाओं में छायादार पेड़ क्यों नहीं हैं?
👉 क्या वन महोत्सव के दौरान गौशालाओं को वृक्षारोपण से बाहर रखा जाता है?
👉 गोवंश संरक्षण की बात करने वाले जनप्रतिनिधि गौशालाओं की स्थिति देखने कब जाएंगे?
👉 टीनशेड की जगह प्राकृतिक छांव की व्यवस्था कब होगी? आदि सवाल आज भी पहाड़ की तरह खड़े हैं।
✍️नागेंद्र सिंह अध्यक्ष फतेहपुर प्रेस क्लब
