सवाल तो पूछेंगे❓
👉सड़कों से गायब हो गए हैं इंकलाबी नारे!!
👉लोकसभा व विधानसभा से कहीं ज्यादा जिला मुख्यालयों को जरूरत है गूंजने वाले इंकलाबी नारों की!!
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“इंकलाब जिंदाबाद”, “जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है” “आवाज दो हम एक हैं”जैसे नारे जब सड़कों पर सुनाई देते थे तो मजबूत विपक्ष के होने का एहसास होता था। सड़के हो या फिर जिलाधिकारी व तहसील मुख्यालय इन सभी स्थानों पर एकत्रित भीड़ के बीच से निकलते नारे सामाजिक माहौल बनाने का काम भी करते थे। लगता है कि सरकार के विपक्ष में राजनीति करने वाले दल ऐसे नारों को भूल चुकी है। राजनीति केवल अब जाति और धर्म के नाम पर ही केंद्रित हो गई है। और इन नारो को लोकसभा व विधानसभा तक ही सीमित कर दिया हैं।
आज से दो ढाई दशक पूर्व जिला मुख्यालय की सड़कों पर हाथों में पार्टी का झंडा लेकर चलने वाली भीड़ से “जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है”जैसे नारे अक्सर सुनाई देते थे। इन प्रदर्शनकारियों की आंखों में किसी भी प्रकार का भय भी नजर नहीं आता था। बेपरवाह बेधड़क सीना तान कर सड़कों पर चलने वाली यह भीड़ किसी मतवाले से कम नहीं होती थी। सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने वाली भीड़ के गायब होने के बाद न केवल सत्ताधारी बेलगाम हुए हैं बल्कि प्रशासनिक अधिकारी व विकास से जुड़े सरकारी कर्मचारी भी निरंकुश हुए हैं। जिसका परिणाम है कि जो सत्ताधारी कहें वही सही। यानी “खाता ना बही जो प्रशासनिक अधिकारी कहें वही सही”।
सवाल तो सरकार के विपक्ष में राजनीति करने वाले दल के लोगों से पूछा जाना चाहिए कि इंकलाबी नारे कहां गायब हो गए। जिन नारो से सड़कें गुलजार हुआ करती थी,सरकारे बदलने में मुख्य भूमिका निभाती थीऐसे नारों को आखिर लोकसभा व विधानसभा परिसर तक ही क्यों सीमित कर दिया गया। जिन प्रदर्शनों व नारों की जरूरत जिले के मुख्यालय को है वही अब क्यों सूने हो गए।
✍️नागेंद्र सिंह अध्यक्ष फतेहपुर प्रेस क्लब
